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दशहरा – बेबी अर्चना
करते बस दहन हम पुतले,
पर जलता नहीं मन का द्वेष।
तभी तो पल-पल, प्रतिपल,
रहता मन का रावण शेष।
काम-क्रोध चतुर्दिक फैले,
दया-करुणा का हो संहार।
मन-मस्तिष्क में भरे पड़े हैं,
दुर्गुण और पतन के द्वार।
मोह-मद-मत्सर मिटाओ,
फैलाओ प्रेम-दया-सद्भाव।
क्रोध-अहं का विष दूर कर
हों निर्मल हर मानव स्वभाव।
क्या होगा बस दहन पुतले से
जब मन में बुराई का वास?
पहले निज अंतर्मन झाँकें,
फिर फैले विजय प्रकाश।
आओ, मन के रावण मारें,
सत्य-धर्म का दीप जलाएँ।
प्रेम, शांति और सद्भाव से,
जीवन सरस सुखमय बनाएं।
बेबी अर्चना
मध्य विद्यालय कुआड़ी

