मन ने चाहा बस इतना,
कोई अपना इतने पास रहे।
दो मीठे से बोल कहे,
थोड़ा-सा विश्वास रहे।
लेकिन सूनी राहों ने,
हर उम्मीद छुपा ली है..
अंतर्मन की बातों ने,
कैसी ये सोच बना ली है
जिसको अपना समझ लिया,
वो भी चुप-सा रहता है।
मेरे मन का हर मौसम,
बिन बारिश ही बहता है।
शिकवा अब करते भी क्या,
सब किस्मत की बात सही।
फिर भी दिल ये कहता है—
हो सकती फिर से बात नई
टूटे सपनों की खुशबू,
अब भी मन में रहती है।
एक छोटी-सी चाह मगर,
हर दिन चुपके से कहती है
काश कि सबकुछ फिर से
पहले जैसा हो जाये
वो अँधेरे ख्वाब भयानक
चुपके से फिर खो जाय…
स्वरचित.
स्मिता ठाकुर
उत्क्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय कर्णपुर, सुपौल

