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काव्य-मुहावरा मंजरी – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
यहाँ हिंदी के कुछ प्रसिद्ध मुहावरों और लोकोक्तियों को काव्य (कविता) के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है:
1. लोकोक्ति: अधजल गगरी छलकत जाए
(कम ज्ञान होने पर अधिक दिखावा करना)
ज्ञान का सागर गहरा होता, शांत सदा ही रहता है,
ओछा मानस तनिक सीखकर, खुद को ज्ञानी कहता है।
जैसे आधी भरी हुई हो, गागर पानी लाते समय,
अधजल गगरी छलकत जाए, चाल जरा-सी खाते समय।
2. मुहावरा: अंगूठा दिखाना
(वक्त पर साफ़ मना कर देना)
कल तक कहते थे जो अपने, संकट में सब दूर हुए,
मदद माँगने जब हम पहुँचे, उनके तेवर क्रूर हुए।
काम निकल जाने पर देखो, बदला सबका बाणा है,
ऐन वक्त पर संकट के बस, अंगूठा ही दिखाना है।
3. लोकोक्ति: खोदा पहाड़ निकली चूहा
(बहुत अधिक मेहनत करने पर भी बहुत कम फल मिलना)
दिन-रात एक करके जिसने, कठिन परिश्रम ठाना था,
सोचा था कि भाग्य खुलेगा, जग में नाम कमाना था।
मिली सफलता इतनी छोटी, हँसने लगा जमाना था,
खोदा पहाड़ निकली चुहिया, यह तो चरित पुराना था।
4. मुहावरा: आँखों का तारा होना
(बहुत प्यारा होना)
आँगन की वह रौनक प्यारी, माँ का कोमल दुलारा है,
जिसकी एक हँसी की खातिर, जीवन अपना वारा है।
पिता सदा गोदी में रखता, कष्ट न कोई पाया है,
वह नन्हा-सा बालक देखो, आँखों का तारा आया है।
5. लोकोक्ति: नाच न जाने आँगन टेढ़ा
(खुद काम न आने पर दूसरों या परिस्थितियों में दोष निकालना)
काम न करना खुद को आए, औरों पर चिल्लाता है,
अपनी ही कमियों को बंदा, समझ नहीं कब पाता है।
खुद से सुर की तान न टूटे, कहता साज पुराना है,
नाच न जाने आँगन टेढ़ा, यह तो बहाना पुराना है।
6. मुहावरा: जले पर नमक छिड़कना
(दुखी इंसान को और दुखी करना)
भाग्य रूठकर दूर खड़ा था, मन में गहरी खाई थी,
दुःख के बादल घिरे हुए थे, चारों ओर तन्हाई थी।
सांत्वना देने के बदले, कटु वचनों की झड़ी लगा दी,
जले पर नमक छिड़ककर उसने, पीर पुरानी और जगा दी।
- चिड़िया चुग गई खेत
(समय बीत जाने पर पछताने से कोई लाभ नहीं होता)
समय हाथ से निकल गया जब, रोने से क्या पाओगे,
पहले आँखें मूँद रहे थे, अब कितना पछताओगे।
अवसर खोकर बैठ गए जो, उनका रोना व्यर्थ यहाँ,
अब पछताए होत क्या जब, चिड़िया चुग गई खेत यहाँ। - मुहावरा: ईद का चाँद होना
(बहुत दिनों बाद दिखाई देना)
तुम तो ऐसे गायब हो गए, ढूँढे से न मिल पाते हो,
याद तुम्हारी आती है पर, तुम न फेरा लगाते हो।
यार पुराने तरस रहे हैं, सूरत ज़रा दिखाओ तुम,
ईद का चाँद बने हो भाई, अब तो मिलने आओ तुम। - लोकोक्ति: जैसी करनी वैसी भरनी
(कर्मों के अनुसार ही फल मिलता है)
जो बोओगे पेड़ बबूल का, आम कहाँ से पाओगे,
जैसा बीज धरोगे भू में, वैसा ही फल खाओगे।
भले-बुरे का न्याय यहीं पर, ईश्वर का यह नियम सही,
जैसी करनी वैसी भरनी, इस जीवन की रीत यही। - मुहावरा: अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना
(स्वयं अपनी प्रशंसा करना)
काम न कुछ भी करके देखा, बातें बड़ी बनाते हैं,
महफ़िल में बस अपनी ही, झूठी शान दिखाते हैं।
जग तो उनकी औकात जानता, हँसता सारा ज़माना है,
अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना, इनका काम पुराना है।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

