करूँ मैं वंदना कब से, विराजो इस हृदय में मां,
अकिंचन जानकर माता, हमें क्यों भूल जाती हो।
संभालो अब मुझे माता ,नहीं तो टूट जाऊंगा।
तुम्हारे ही सहारे से यह
जीवन पथ सजाया था।
अंधेरों में दिया बनकर, मुझे चलना सिखाया था ।
विराजो इस हृदय में मां ,मुझे क्यों भूल जाती हो।
संभालो अब मुझे माता ,नहीं तो टूट जाऊंगी।
भटकता हूं दिशाहीन अब, न कोई आस बाकी है।
तुम्हारा स्नेह की छतरी ही ,मेरी एक
सखी है।
दया की एक दृष्टि से ,मेरा संसार रौशन कर दो
चरण की धूल देकर मां मेरा जीवन सफल कर दो।
अकिंचन जानकर माता हमें क्यों भूल जाती हो।
संभालो अब मुझे माता ,नहीं तो टूट जाऊंगी।
विराजो इस हृदय में मां ,हृदय से शीश झुकाती हूं ।
सुबाला कुमारी
हिंदी शिक्षिका

