मन वीणा की तुम झंकार बनो – मनु कुमारी
तुमपर तन मन दुनियां वारी,
भटकी मैं प्रेम की गलियारी।
सुध – बुध अपनी मैं भूल गई,
मैं लोक लाज सब छोड़ गयी।
मेरे प्रीत की रखो लाज सनम,
मेरे प्रेम का गृमल हार बनो।
उर वीणा की तुम झंकार बनो।
क्यों सबकुछ कहना पड़ता है,
कभी नैनों को भी पढ़ लो तुम।
जब रहूं अकेली तन्हा मैं,
तब आकर गले लगा लो तुम ।
मैंने जीवन सौंप दिया तुमको,
मेरे जीवन का आधार बनो।
उर वीणा की तुम झंकार बनो।
रूठो सही पर बात करो,
चुप रहकर मत अघात करो।
तुम बिन भाये ना कुछ भी सनम,
तुम हीं तो हो मेरी जान सनम।
मेरे आंगन के गुलजार हो तुम,
मेरी खुशियों के संसार हो तुम ।
मेरे प्रीत का तुम उपहार बनो,
उर वीणा की तुम झंकार बनो।
स्वरचित:-
मनु कुमारी,विशिष्ट शिक्षिका,
प्राथमिक विद्यालय दीपनगर बिचारी, राघोपुर, सुपौल
