हां मैं एक औरत हूं ।
सृष्टि की निर्माणकर्ता
समर्पण ममता की मूरत
त्याग बलिदान, कोमलता की सीरत
प्रतिदिन घर के कामों में
खुद को व्यस्त रखना
पूजा की वंदना
अर्चना करना
पति बच्चों की सेवा करना
कभी रोज लकड़ियां चुनकर
डिबिया की रोशनी
में चूलहे फूकती
कष्ट हो फिर भी
मुस्कुराती रहती
कभी रेगिस्तान में
पैदल चलकर
मटके में पानी ढोती
कितने भी काम हो
पर उफ ना करती
कभी भूख से बिलखते
बच्चों की खातिर
दर-दर भीख मांगती
जो शर्म- लज्जा से भी
जी चुराती
कभी चंद पैसों के खातिर
बहशी -दरिंदों के
यहां बेची जाती
तमाशा बनकर सबके
इशारे पर नाचती
जिसने जैसा चाहा
वैसा ही बन जाती हूं
मेरे स्वभाव को मेरी
कमजोरी ना समझना
जब आन पर आ जाऊं
तो चंडी का रूप धारण कर
महिषासुर का वध कर सकती हूं
गीत संगीत सुना सकती हूं
तो पूरी दुनिया भी
हिला सकती हूं
कुछ नहीं मुझ को
सम्मान चाहिए
प्यार के मीठे बोल मिले
खुलकर जी सकूं
दुनिया में यह सुकून चाहिए
हां मैं एक औरत हूं
मुझे अपना हक चाहिए
लवली कुमारी
उत्क्रमित मध्य विद्यालय अनूप नगर
बारसोई
कटिहार

