बनकर कान्हा गिरधारी – गीत लीलाधर ने भू पर आकर, लीला की अद्भुत न्यारी। शोक मिटाए ब्रज वनिता की, बनकर कान्हा गिरधारी। पूजन रोका जब सुरपति का, इंद्र कोप थे…
गोवर्धन धारी -रामकिशोर पाठक
गोवर्धन धारी – गीतिका गोवर्धन की पूजा करने, निकले हैं सब नर नारी। करके मर्दन मान इंद्र का, झूम रहे गिरिवर धारी।। गोकुल वासी पूजन करते, सुरपति खुश हो जाते…
स्वास्थ्य बैकुंठ बिहारी
स्वास्थ्य स्वास्थ्य का ध्यान रखिए, यह प्रकृति की अनुपम भेट है। उत्तम स्वास्थ्य ऊर्जा प्रदान करता है, अंग प्रत्यंग को स्फूर्तिमान करता है, आशाओं की नई किरण जगाता है, अनायास…
ओ भैया आयल रे भैया-अवधेश कुमार
ओ भैया आयल रे भैया दीपक रौशनी झल‑झल हे, नीप कै झलकै घर‑आँगन रे। बहिन अरिपन बनबै ये पीढ़ी पर , थार सजा आरती फूलक तिलक रे। ओ भैया आयल…
मां की लाल साड़ी – अवधेश कुमार
माँ की लाल साड़ीअलमारी के कोने में अब भी टंगी है वो लाल साड़ी,जिसमें बसती है माँ की मुस्कान — प्यारी, आत्मीय, सादगी से भरी।दीवाली की रात हो या छठ…
ढूंढता हूं अवनीश कुमार
“ढूंढ़ता हूं” मैं माँ की सुनी माँग में उस दमकती सुंदर आभा — ‘सिंदूर’ की वह पावन आभा ढूंढ़ता हूं, जिसमें बसती थीं उसके जीवन की उजली सुबहें, जिससे उसके…
ज्योति-पर्व दीपावली- गीत
ज्योति-पर्व दीपावली- गीत हर्षित आज सभी नर-नारी, सुंदर सुखद तराना है। अगणित दीप जलाकर भू का, सारा तिमिर मिटाना है।। आज अमावस हार गया है, नहीं तिमिर टिकने वाला। फैला…
कचरे की ढेर जैनेंद्र प्रसाद
कचरे की ढेर समसामयिक रचना सबको दे खुशहाली, चली गई ये दिवाली, बाजारों में जमा हुई, कचरे की ढेर है। जश्न पुरज़ोर होता, पटाखे की शोर होता, जागने से आंखें…
भुला नहीं हूं -बैकुंठ बिहारी
भूला नहीं हूं बाल्यावस्था की शरारत भूला नहीं हूं, माता-पिता की आंखों में प्रसन्नता के अश्रु भूला नहीं हूं, किशोरावस्था का उतार-चढ़ाव भूला नहीं हूं, काम, क्रोध, मद लोभ, मोह…
गोवर्धन- राम किशोर पाठक
गोवर्धन- पादाकुलक छंद आधारित गीत व्रज वनिता के वासी प्यारे। मोहन नख पर पर्वत धारे।। सुरपति जमकर जल बरसाए। व्रजवासी जिससे घबराए।। कान्हा बनकर खेवन हारे। मोहन नख पर पर्वत…