चिंतकों के मध्य शिक्षा -रामपाल प्रसाद सिंह

RAMPAL SINGH ANJAN

गीतिका छंद
चिंतकों के मध्य शिक्षा,आज भी बेचैन है।

नीतियों में हम निपुण थे, धर्म का बस राज था।
जोड़कर संस्कार सचमुच, सिर रखा बस ताज था।।
कंटकों पर रंक-राजा, पुत्र सोते थे जिधर।
जंगलों में वास करते, दुख मगर सोते निडर।।

है नहीं शिक्षा हमारी, जो कभी थी पास में।
पुत्र राजा भी चला था, वेश-भूषा दास में।।
बंदिशों को मान रखते, सीखते कौशल सभी।
गलतियाॅं स्वीकारते वे, दंड पाते थे कभी।।

उस समय थी नीति जिंदा, उफ़!नहीं करते कभी।
थे पिता-माता मगर वे, त्याग करते थे सभी।।
काटकर शिशु का ॲंगूठा, क्या भला वह न्याय था।
मानता हूॅं खुद दिया वो, क्योंकि वह निरुपाय था।।

बस यही गाथा सुनाकर, रोक दी चलती छड़ी।
दूरियाॅं बढ़ती तभी से, दिखती टूटती कड़ी।।
भाव दुर्गुण आज तक, “अनजान” सहते जा रहे।
शिष्य पर रुकती छड़ी से, द्वेष बढ़ते जा रहे।।

बिन किनारों की नदी कब, नीर कैसे? बाॅंधती।
आज शिक्षा हो गई कुछ, भूत को कब मानती।।
चिंतकों के मध्य शिक्षा, आज भी बेचैन है।
सत्य की पगडंडियों पर, बस फिसलते नैन हैं।।


रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
अवकाश प्राप्त शिक्षक
मध्य विद्यालय दर्वेभदौर

0 Likes
Spread the love

Leave a Reply