दहलीज -रुचिका

दहलीज

हर बार वह सोचती की अब नही,
मगर कदम उसके ठहर जाते थे
घर की दहलीज पर
घुटती रहती थी
मगर हिम्मत नही जुटा पाती थी
की छू ले नभ की ऊँचाई को
और सिमट जाती थी अपने ही दायरे में।

मिली प्रेरणा उसके वजूद को
जब निकली अचानक दहलीज के बाहर।
देखा कितनी मुश्किलों पर भी
कुछ कदम कभी थमते नहीं।
टूटते,बिखेरते स्वयं को समेटते
उड़ने की कोशिश में लगे रहते हैं।
जमीं को थामे गगन को छूने की कोशिश करते हैं।

और फिर आखिरी बार उसके
कदम ठहरे घर की दहलीज पर।
उसके बाद वह निरन्तर आगे बढ़ती
हर असम्भव को सम्भव करती
वह आखिरी बार ही उसकी
सुखद शुरुआत थी
एक नए अस्तित्व को पहचान देने की
सुखद आस थी।

रूचिका
प्रधान शिक्षिका
राजकीयकृत प्राथमिक विद्यालय कुरमौली गुठनी सिवान बिहार

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