धरती का अनमोल रत्न हूँ, नभ का गोरा चाँद हूँ,
मैं कपास का रूप नहीं, इस सृष्टि का वरदान हूँ।
श्वेत स्वर्ण कहते हैं मुझको, महिमा मेरी अपरम्पार,
सभ्यता को मर्यादा देने, लिया धरा पर यह अवतार।
मेरे बिन यह विश्व अधूरा, मानव नंगा रह जाता,
शीत-घाम की क्रूर थपेड़ों में प्राणी जीवन खो जाता।
मैंने ही मखमली रेशों से लाज बचाई सृष्टि की,
मेरे रूप में साक्षात हुई है, दया रूपी प्रभु-दृष्टि की।
खेतों की छाती पर जब मैं, श्वेत मुकुट बन हँसता हूँ,
दीन-हीन कृषक के सूने, भाग्य-गगन में बरसता हूँ।
सोना-चाँदी फीके पड़ते, जब मेरा व्यापार चला,
कृषक को सम्राट बनाने, मेरा एक-एक तार चला।
मुझसे ही चलती हैं मिलें, मुझसे सजता है यह संसार,
मैं ही वस्त्र, मैं ही वैभव, मैं ही जीवन का आधार।
मानव तन और कृषक भाग्य का, मैं ही सच्चा तारणहार।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया
07.10.2026

