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आँसू और खामोशी- कुण्डलिया
आँसू मेरे नैन में, पत्नी देखी आज।
तंज कसी जमकर तभी, कैसा रहा मिजाज।।
कैसा रहा मिजाज, समझ मुझको है आई।
दो दिन पीहर वास, हमारी तुझे सताई।।
रहती जब मैं पास, निकलती बोली धाँसू।
देख लिया औकात, निकल आई है आँसू।।
खामोशी अच्छी लगी, मैनें ली थी साध।
देख पिया मुख बोलती, गृहिणी थी निर्बाध।।
गृहिणी थी निर्बाध, सुनाती प्रवचन अपनी।
मैनें धोया आँख, चली आई भी रजनी।।
हुई नहीं वह मौन, अलग उसकी मदहोशी।
दो घंटे के बाद, वही फिर से खामोशी।।
रचयिता:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
प्राथमिक विद्यालय कालीगंज उत्तर टोला, बिहटा, पटना, बिहार।
संपर्क – 9835232978

