एक क्षण चाहिए नव सृजन के लिए ( गीत)
एक क्षण चाहिए नव सृजन के लिए ।
भावनाओं के नव उन्नयन के लिए ।।
बढ़ रहा आज तम, रौशनी क्षीण है
सूखते सर सभी, व्यग्र सी मीन है
संतुलन आज सारा बिगड़ने लगा
घन प्रतीक्षा निरत हैं पवन के लिए ।
एक क्षण चाहिए नव सृजन के लिए।।
अब समय का अनोखा यहां खेल है
राम रावण का कैसा हुआ मेल है
दर्द सीता का अब और भी बढ़ गया
अश्रु कब थम सके एक क्षण के लिए ।
एक क्षण चाहिए नव सृजन के लिए।।
मान्यताएं हमारी पुरानी हुईं
अब विगत की ये भूली कहानी हुईं
नग्नताएं हमारी उघड़ने लगीं
आश लेकर खड़ी आवरण के लिए ।
एक क्षण चाहिए नव वर्ष के लिए।।
क्षीण सी सृष्टि को आज निर्माण दो
क्रांति लाए जगत में वही गान दो
शस्त्र के साथ ही शास्त्र भी चाहिए
सृष्टि में शक्ति के संतुलन के लिए।
एक क्षण चाहिए नव सृजन के लिए ।।
पग बढ़ें पर हमें पथ की पहचान हो
मार्ग में लक्ष्य का भी हमें ज्ञान हो
हमने पाया है क्या और क्या खो दिया
हम रुकें एक पल आकलन के लिए।
एक क्षण चाहिए नव सृजन के लिए।।
ARJUN PRASAD SINGH PRABHAT


