लोरी

स्वरचित एवं मौलिक रचना

रचनाकार – योगेश कुमार पाण्डेय

उ० मा० वि०, तुमकड़िया, बैरिया

8851142751

 

1. “दिल मोरा घबराए रे”

 

पागलपंती करे इ मनवा

दिल मोरा घबराए रे।

 

कूद-कूद के पेड़ प’ बइठे

चिरई उड़-उड़ जाए रे

कभी कूद छानी पर जाए

कभी नीचे गिर जाए रे

पागलपंती करे इ मनवा

दिल मोरा घबराए रे।

 

उड़ के चले अनन्त गगन में

बादल के ऊपर जाए रे

कभी कूदे पानी के नीचे

मछरी के मीत बनाए रे

पर्वत के कभी पार करे इ

कभी धरती ऊपर गाए रे

पागलपंती करे इ मनवा

दिल मोरा घबराए रे।

 

रोए-गाए कभी मुस्काए

जीवन संगीत सुनाए रे

चले कभी आँधी के भांति

कभी बसंती हवा बहाए रे

कभी गरमी के गरम लूँ-सा

कभी निर्झर बन जाए रे

पागलपंती करे इ मनवा

दिल मोरा घबराए रे।

 

अमवा की डाली पर बइठे

कोयल सी कूहकाए रे

कभी झील ताल किनारे

मयूरा के नाच दिखाए रे

कभी मेघन से बात करे रे

मेंढक सा टर्राए रे

कभी बइठे साँपों के आगे

नाकों से बीन बजाए रे

पागलपंती करे इ मनवा

दिल मोरा घबराए रे।

 

कभी तिल के ताड़ करेला

कभी पर्वत के राई रे

कभी दोसरा के ठग के आवे

कहे एकरा चतुराई रे

कभी सीखे दुनिया से झूठ

कभी बाचे सच्चाई रे

पागलपंती करे इ मनवा

दिल मोरा घबराए रे।

#कवि_महोदय #योगेश_कुमार_पाण्डेय

स्वरचित कविता

योगेश कुमार पाण्डेय

उ० मा० वि०, तुमकड़िया, बैरिया

8851142751

 

2. “बादल और बच्चे”

 

बारिश होती मूसलाधार

आँधी आई पेड़ उखाड़

चोरी-छिपे बच्चे भागे

कोई पीछे कोई आगे

बादल गड़गड़ करता है

दिल में डर-डर लगता है

हम सब बच्चे प्यारे-प्यारे

माँ पापा के बड़े दुलारे

मम्मी जल्दी आओ ना

बारिश से हमे बचाओ ना

बादल भी बिजली चमकाता

पानी की बूंदें बरसाता

बोला तुम्हें भीगाऊँगा

गरजकर तुम्हें डराऊँगा

हम थे बच्चे खेलने आए

तुमने हम सब को नहलाए

बादल काका जाओ ना

अब तो हमें सताओ ना

मम्मी हमको डांटेगी

कान पकड़ कर मारेगी

बोला बादल घर जाओ

घर में जाकर छुप जाओ

तुमको नहीं भीगाऊँगा

अबसे नहीं सताऊँगा

पर मैं तो अपना काम करूँ

धरती को खुशहाल करूँ

गर्मी ने बेहाल किया

सबका जीना काल किया

बच्चे सब देते धन्यवाद

तुम करते सबको आबाद

हम सब बच्चे घर जाएंगे

चॉकलेट-टॉफी खूब खाएंगे

लेकिन कल फिर खेलने आएँगे।

#कवि_महोदय #योगेश_कुमार_पाण्डेय

स्वरचित कविता

योगेश कुमार पाण्डेय

उ० मा० वि०, तुमकड़िया, बैरिया

8851142751

 

3. “कभी हमसे ना टकराना”

 

हाथियों की फौज

चली करने मौज

चीटियों ने घेरा

लगाया सात फेरा

चीटियों ने बोला

जो दिमाग उनका डोला

तो सूँढ़ में घुसेंगे

फिर हलचल करेंगे

हाथियों की सटकी

की नाक लम्बी लटकी

ये चीटियां अड़ी हैं

चारों तरफ खड़ी हैं

हाथियों ने फिर चिंघाड़ा

चीटियों को ललकारा

तुम हमसे जो टकराओ

बेमौत मरने आओ

हम तुमको मसल देंगे

पैरों से कुचल देंगे

फिर चींटियां चिल्लाई

आओ करो लड़ाई

तुम तन में बड़े होगे

हौसलों में हम बड़े हैं

ओ हमें कुचलने वाले

हम सामने खड़े हैं

अरे हाथियों के बच्चे

अभी हो तुम सब कच्चे

तुम हमसे ना टकराना

अपनी मौत ना बुलाना

हम सब जब भिड़ेंगी

तुम को भी चट करेंगी

हमें कमजोर ना समझना

जब राह पर निकलना

हिदायत ये है, धमकी भी है

हम शांत हैं, सनकी भी हैं

बात हमारी मान लो

दिमाग में गाँठ बाँध लो

आगे से हम हटेंगे

अपनी राह तुम निकलना

अपनी राह हम चलेंगे

तुम पीछे नहीं पलटना।

Bye-bye.

#कवि_महोदय #योगेश_कुमार_पाण्डेय

स्वरचित कविता

योगेश कुमार पाण्डेय

उ० मा० वि०, तुमकड़िया, बैरिया

8851142751

 

4. “मस्तानों की कश्ती”

 

हम मस्ताने मस्ती में

चलें सवार कश्ती में

संग में अपने चिड़िया गाए

चारों ओर है मस्ती छाए

मांझी की सुन्दर मुस्कान

लहरे आई सीना तान

नाव पे हमने की सवारी

लहरों के बीच फंसी बेचारी

लहरों में है नाव हमारी

ख़तरे में है जान हमारी

लहरे ऊपर चढ़ती जाएँ

नाव डगमग करती जाए

हम सब रब तेरी संतान

आओ आज बचाओ जान

प्रभु की महिमा हुई है भारी

लहरों ने बक्शी जान हमारी

प्रभु को मन में रखकर ध्यान

अब हम सब गाएँ गुणगान

फिर आगे को चली सवारी

हमनें मस्ती की ढेर सारी

हम मस्ताने मस्ती में

चलें सवार कश्ती में।

#कवि_महोदय #योगेश_कुमार_पाण्डेय

स्वरचित कविता

योगेश कुमार पाण्डेय

उ० मा० वि०, तुमकड़िया, बैरिया

8851142751

 

5.    *  प्रकृति  *

 

रच रहे राग विहग भोर में उठकर

जगा रहे उपवन, करते शोर चहक कर

झाँकती अरुण की लाली तरु की डाली से

भौंरा करता मनमानी फूल मतवाली से

रंगते रंग कण कण को अपने रंग में

सिमटती निशा, फैलते प्रकाश के अंग में

रंगों ने रंगी नई सुबह की अल्पना है

सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम प्रकृति की कल्पना है

जगा रहे वन, गिरी, सरिता, सरोवर

रच रहे राग विहग भोर में उठकर।

#कवि_महोदय #योगेश_कुमार_पाण्डेय

   स्वरचित कविता

योगेश कुमार पाण्डेय

उ० मा० वि०, तुमकड़िया, बैरिया

8851142751

 

6.    ** आया बसंत **

 

आया बसंत बहार लुटाने

ठण्डी के जाने के बाद

धरती की खुशहाली लेकर

पेड़-पौधे करने आबाद

 

सारी धरती मुस्काई है

कलियाँ देखो खिल आई हैं

निर्झर कल-कल बहता जाए

खेतों में सरसों फूल फुलाए

 

आमों की बगिया भी देखो

सुगंधित मोज़र कहती है

किसी डाल पर कोयल काली

कूक – मारकर हँसती है

 

सब पौधों में फिर से देखो

नए पत्ते अब उग आए हैं

नीले, पीले, लाल, गुलाबी

सुन्दर फूल भी खिल आए हैं

 

धरती हो गई रंग-बिरंगी

ठण्डी के जाने के बाद

आया बसंत बहार लुटाने

ठण्डी के जाने के बाद।

#कवि_महोदय #योगेश_कुमार_पाण्डेय

     स्वरचित कविता

योगेश कुमार पाण्डेय

उ० मा० वि०, तुमकड़िया, बैरिया

8851142751

 

7. “रानी की कहानी”

 

रात रानी, राज रानी

            एक राजा की सात रानी

छोटी वाली बड़ी सयानी

            बाकी लूली, लंगड़ी, कानी

राजा भी था कान से बहरा

            बालों का रंग लाल सुनहरा

उसके मुँह में दांत नहीं थी

            बाएँ तरफ़ की हांथ नहीं थी

छोटी रानी करती थी मौज

            हरदम खाती राजसी भोज

देखा करती सब कामकाज

            राजा को था उसपर नाज़

बाकी रानियाँ लड़ती थीं

            राजा से सब डरती थीं

नहीं करता था उनसे प्रेम

            ना कभी पूछे कुशलक्षेम

एक बार की बात थी

            काली अँधेरी रात थी

राजा रानियों संग पड़ा था

            उसका मन ख़ुश बड़ा था

पर गुस्से में थी छह रानियाँ

            देख राजा की बेईमानियाँ

छहों ने मिलकर मारी लात

            राजा मर गया बढ़ गई बात

छोटी ने सैनिक बुलवाए

            सबको फांसी पर लटकाए

मौज मस्ती में खो गई रानी

            लो अब ख़त्म हुई कहानी।

#कवि_महोदय #योगेश_कुमार_पाण्डेय

स्वरचित कविता

योगेश कुमार पाण्डेय

उ० मा० वि०, तुमकड़िया, बैरिया

8851142751

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Yogesh Kumar

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