आपका ब्राउज़र Text-to-Speech सपोर्ट नहीं करता।
तुम पर्वतों के समान बनो, आँधियाँ भी मुड़कर लौट जायें
तुम पर्वतों के समान अचल बनो,
आँधियाँ भी स्पर्श कर लौट जायें।
तुम शैल-शिखर-सा उत्तुंग धैर्य धरो,
तुम प्रस्तर-वत् दृढ़ संकल्प धरो।
वात्याचक्र, झंझावात जब गर्जे,
तुम अडिग, अविचल, प्रचंड खड़े रहो।
नयन में विद्युत्, हृदय में ज्वाला हो,
वाणी में पर्वत-निर्झर की धारा हो।
तुम हिमगिरि-सा श्वेत, पावन चरित्र रखो,
तुम सागर-सा गंभीर, विस्तृत हृदय रखो।
विघ्नों का प्रबल पवन जब आएगा,
तुम्हारे चरणों से टकरा कर जाएगा।
जो दुर्बल हैं, वे वायु में बिखरते हैं,
जो पर्वत हैं, वे इतिहास रचते हैं।
तुम न झुको, न डिगो, न स्वयं से हारो,
तुम अंधकार में भी आलोक संवारो।
आँधियाँ तो आती हैं परीक्षा लेने,
पर्वत ही बनते हैं पथ प्रदर्शक होने।
इसलिए उठो, स्वयं को शैल बनाओ,
आँधियाँ भी मुड़कर लौट जायें, ऐसा व्यक्तित्व बनाओ।
– गौरव कुमार तिवारी
जनपद बलिया उत्तर प्रदेश
Gaurav Kumar tiwari


