लूना, बखरा और परमार की धार,
सदियों से जिसके पाँव पखार रही है।
अररिया की धरती बहुत याद आएगी।
परती परिकथा की ऊसर ज़मीन,
‘मैला आँचल’ की आँचलिक कथा,
आँचलिक कथाकार, शिल्पकार रेणु की ‘ठेस’,
कला एवं सामाजिक प्रतिष्ठा-बोध लिए जीता
निर्धन शिल्पकार सिरचन की कथाभूमि—
अररिया की धरती बहुत याद आएगी।
सुंदरनाथ धाम का सुंदर शिव मंदिर,
बांग्ला संस्कृति का काली मंदिर,
अररिया की जामा मस्जिद और
फारबिसगंज का सुल्तान पोखर।
हिन्दी, उर्दू, मैथिली और बांग्ला भाषाओं के साथ
कुल्हैया, शेखरा और ठेठी की स्थानीय बोलियाँ।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई धर्मावलंबियों की
आपसी सहिष्णुता और भाईचारे का भाव—
अररिया की धरती बहुत याद आएगी।
छात्र-छात्राओं का अनुशासन,
शिक्षकों के प्रति अविश्वास का माहौल,
इसके बावजूद अभिभावकों का
हमारे शिक्षकों पर अटूट विश्वास,
उस विश्वास को कभी न टूटने देने का अथक प्रयास,
शिक्षकों का अध्यापन के प्रति समर्पण।
शिक्षक संगठनों के पदाधिकारी,
अब्दुल कुद्दूस की पवित्र भावना,
अजय जी का अजेय विश्वास,
आदिल का न्यायिक विचार,
प्रशांत का महासागर-सा शांत चित्त,
रहमानी की रहीमी—
आप सबका प्रेम और सहयोग
बहुत याद आएगा।
विशेष कक्षा की टीम का संयोजन,
निरंजन का नीलकंठ-भाव,
आर्शीदा-सा मार्गदर्शन, सोफिया का ज्ञान,
दानिश और मुशीर-से योजनाकार,
विवेक-सा विचारशील व्यक्तित्व,
दारिश-सा दर्शन, सायेम का संयम,
शशि-सा आलौकिक तेज,
दानियाल की प्रबुद्धता,
अमर और अविनाश की शाश्वत्ता,
और नरसिंह-सा संरक्षक भाव।
आप सभी की कमी
मुझे हमेशा खलेगी।
अररिया की धरती बहुत याद आएगी।
श्री संजय कुमार
निवर्तमान जिला शिक्षा पदाधिकारी, अररिया

