पद्यपंकज Bhawna,बच्चों का खेल,बाल कविता बच्चों की शरारत – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

बच्चों की शरारत – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर


Dharmendra

सुबह सवेरे बजती घंटी, खुल जाते विद्यालय के द्वार,

मानो टूट पड़ा हो धरती पर, नन्हें वीरों का संसार।

लाखों पैर पटकते आते, बस्तों में तूफ़ान छुपाए,

सूरज भी सहम जाता है, जब बच्चों की यह फौज आए!

ये किलकारी, ये हुड़दंग, जैसे गूंज रहा हो कोई सिंहनाद,

किताबें खुलते ही रचते हैं, ये रोज नया एक इतिहास।

पढ़ना-लिखना तो बस बहाना है, असली मकसद मौज उड़ाना,

ब्लैकबोर्ड पर चॉक चलाकर, पूरी दुनिया को नचाना।

मैडम जब लिखने को कहतीं, ए-बी-सी-धरडी या क-ख-ग-घ,

ये चुपके से पेन छुपाकर, उड़ा देते हैं सबका होश!

माता घर से टिफिन सजातीं, भरकर प्यार और पकवान,

पर स्कूल पहुंचते ही देखो, बदल जाता है सारा जहान।

फर्स्ट पीरियड ख़त्म न होता, खुल जाते हैं सारे डिब्बे,

हवा में तैरने लगती खुशबू, गायब परांठे और लड्डू पक्के।

तीसरी बेंच पर बैठा राहुल, चौथी बेंच का समोसा खाए,

जिसका टिफिन था, वो बेचारा खाली डिब्बा देख चकराए!

बिना चबाए, पलक झपकते, पूरा टिफिन हजम है जाता,

गुरुजी पूछते- “किसने खाया?”, तो कोई सुराग ढूंढ नहीं पाता।

यह बचपन की वो सेना है, जो भूख के आगे न झुकती है,

लंच ब्रेक होने से पहले, जिनकी दावत कभी न रुकती है

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

प्राथमिक विद्यालय रेही टोला रानीगंज अररिया।

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