बसंत का आगमन -जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’

Jainendra

खेतों में हरियाली शोभें सरसों-अलसी बलखाती है।

ऋतुराज के स्वागत में कोयल गीत खुशी से गाती है।

नव पल्लव पा मधुबन हंँसता कलियांँ खिलती हैं धीरे,

हरे दूब पर बिछें हैं मोती जैसे लगते हैं हीरे।

आतुर है बसंत आने को प्रकृति भी हर्षाती है।।

निर्मल हो गए ताल-तलैया शान्त हुई जलधारा है,

चांँदी जैसा बिछा सिकता चमकता स्वच्छ किनारा है।

धूप सेंकने तट पर मीनें आने से घबराती हैं।।

अच्छी लगती सर्द हवाएंँ धीरे से जो तन को छूती,

बिल में दुबका का घना कुहासा जिसकी बोलती थी तूती।

मौसम बदला जाड़ा भागा धूप नहीं अब भाती है।।

भांँति-भांँति के फूल खिले हैं वन-उपवन और बागों में।

आसमान में चिड़ियांँ उड़तीं घुंघरू बांँधे पागों में।

हरदम आगे बढ़ने को आपस में होड़ मचाती हैं।।

बसंत ब्यार पर हो सवार आई रंगों की होली,

यौवन मद में सराबोर हो झूमते युवकों की टोली।

आज मधुप को देख मिलन से तितली भी शर्माती है।

ऋतुराज के स्वागत में कोयल गीत खुशी से गाती है।।

जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’

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