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दुनिया दौलत वालों की
मनहरण घनाक्षरी छंद
भाग-१
किसी को तो दूध-भात
मक्खन सुहाता नहीं,
किसी को नमक-रोटी, मिलता न थाली में।
किसी को तो भर पेट
मिलता भोजन नहीं,
किसी का तो घर दूध, बहता है नाली में।
किसी को तो सिर पर
रहने को छत नहीं,
किसी को बंदूक धारी, होते रखवाली में।
कोई यहांँ बदन का
करते हैं नुमाइश,
किसी का जीवन बीत, जाता बदहाली में।
भाग-२
गम से बेहाल कभी
आती रात नींद नहीं,
किसी की तो रातें रोज, कटती क़व्वाली में।
कहीं सच्चा प्यार बिना
जिंदगी उदास होती,
कहीं फूल खिला मिले, बिना पत्ता डाली में।
किसी को मेहनत से
मिलता फुर्सत नहीं,
किसी का समय नहीं, कटता है खाली में।
अधिकांश विद्यार्थी तो
मेहनत करते हैं,
कुछ तो खरीदते-प्रमाण पत्र जाली में।
जैनेन्द्र प्रसाद ‘रवि’

