आपका ब्राउज़र Text-to-Speech सपोर्ट नहीं करता।
गज़ल – रखशां हाशमी
है अंधेरों में रौशनी उम्मीद
सच में होती है ज़िंदगी उम्मीद
आस जब जब लगायी अपनों से
हमने देखी है टूटती उम्मीद
हम बड़े एैतमाद से टूटे
थी हमें आप से बड़ी उम्मीद
आस शीशा नहीं है पत्थर है
मेरी टूटी नहीं अभी उम्मीद
एक इमकान हो गया रौशन
जगमगाई गली गली उम्मीद
आखिरी तीर तू ही तरकश का
बस तू ही मेरी आख़िरी उम्मीद
दिल का रखना भी इक इबादत है
तोड़ना मत कोई कभी उम्मीद
फिर से सूरज नया उगा रख़शां
नींद टूटी जगी नयी उम्मीद
रखशां हाशमी
प्रधान शिक्षक
बोधगया
गया जी

