माँ के आँचल में पलता,
संतान का हर एक संसार,
उसकी खुशियों की खातिर माँ,
सह लेती हर दुख अपार।
संतान की लंबी उम्र की खातिर,
माँ रखती है कठिन उपवास,
होठों पर रहती उसकी दुआ,
मन में रहता विश्वास।
न अन्न का मोह, न जल की चाह,
बस संतान की सलामती की आस,
माँ की ममता के आगे फीका,
दुनिया का हर भोग-विलास।
यह केवल कोई व्रत नहीं,
माँ के त्याग की अमिट कहानी है,
हर धड़कन में बसी संतान,
हर प्रार्थना में उसकी निशानी है।
माँ की ममता सागर जैसी,
जिसका कोई छोर नहीं,
संतान के सुख से बढ़कर
माँ के लिए कोई और नहीं।
जितिया का यह पावन पर्व,
माँ के प्रेम का सुंदर प्रमाण—
माँ की दुआओं से महके सदा,
संतान का जीवन और मुस्कान।
रंजना कुमारी
खम्हार विभूतिपुर समस्तीपुर
रंजना कुमारी

