मजदूर
कभी चिमनियों में ईंट बनाते,
कभी ईंट वह स्वयं बन जाते।
कभी कारखानों , उद्योगों की, श्रम अग्नि में स्वयं तपाते।
कभी ऊंची इमारतों के ऊपर चढकर,
अपनी जीवन का दांव लगाते।
स्वयं अधूरे रहकर सबके ,सपनों में रंग भर जाते।
दो जून की रोटी खातिर हर दिन, मौत से जूझते देखा है,
हां मैंने मजदूर को बहुत करीब से देखा है।
खेतों की मिट्टी में तन सने हुए ,
पैर की उंगलियों में पड़े छाले,
ठेले खींचने से हथेलियों में ,पड़े गड्ढे की निशान छुपाते,
गरीबी की मार झेलकर भी, संतानों की हर जरूरत पूरा करते,
बड़ी से बड़ी विपत्तियों में भी
उन्हें मुस्कुराते हुए देखा है।
हां ,मैंने मजदूर को करीब से देखा है।
कपड़े हो या फर्नीचर,जीवन से जुड़े हों सारे काम।
मजदूर बिना कुछ भी नहीं संभव,मन से करता वो काम तमाम।
कभी भूखे बच्चे, पत्नी बीमार।
कभी दुख की त्रासदी में जीवन की हार ।
कई दफा मशीनों में हमने,उसके हाथ – पांव कटते देखा है।
उसके हाथ में खींची ना जाने,
कैसी किस्मत की वो रेखा है।
कहता सदा खुशी से वह ,यह तो विधि का बस लेखा है।
हां , मैंने मजदूर को बहुत करीब से देखा है।
फटी एड़ियां संघर्ष की नित्य नई कहानी कहते,
सिर पर बंधी स्वाभिमान की पगड़ी,मन में आत्मविश्वास हैं भरते।
मेहनत की पगड़ी सिर पर बांधे, हर बाधाओं को पार वह करते।
मेहनत,लगन, त्याग, प्रेम से,
परिवार को जीवन की कला सिखाते।
विपत्तियों में भी धीरज धरना,
यह मूलमंत्र सबको बतलाते।
थोड़ी सी भी कमाई में उसे, संतुष्ट होते देखा है।
हां मैंने मजदूर को करीब से देखा है।
लोभ , लालच ज्यादा कि नहीं ,
मेहनत के मुताबिक मजदूरी लेते।
पवित्र जीविका करके हर दिन,
रात को चैन की नींद हैं सोते।
बच्चों को शिक्षित करने को,
हर पल वह प्रयत्नशील रहते।
समाज में कभी उपेक्षित होते,
कभी व्यंग्यबाण भी सहते।
बेटी की ब्याह में महाजनों के,
पैरों में गिरगिराते हुए भी देखा है,
हां, मैंने मजदूर को बहुत करीब से देखा है।
मजदूर हैं करते बड़े उपकार,इनका कभी ना करो तिरस्कार।
इनका नहीं हम करें अपमान, हर मन में हों इनके प्रति सम्मान।
इनको मिले इनका अधिकार,स्वस्थ जीवन, स्वस्थ संसार।
स्वास्थ्य शिक्षा और मिले रोजगार,प्रेम स्नेह समानता का व्यवहार।
मजदूर के बच्चों को भी हमने अफसर बनते देखा है,
हां ,मैंने मजदूर को बहुत करीब से देखा है।
स्वरचित एवं मौलिक
मनु कुमारी, विशिष्ट शिक्षिका, प्राथमिक विद्यालय दीपनगर बिचारी, राघोपुर,सुपौल

