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॥ नवदुर्गा स्तुति ॥ – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्रथम रूप शैलपुत्री माता, कष्ट निवारण करने आती,
हिमालय की वो पावन कन्या, मूलाधार में वास कराती।
हाथ त्रिशूल और कमल सुशोभित, वृषभ सवारी मन को भाती,
जीवन में स्थिरता लाती, भक्तों का संकट हर जाती।
द्वितीय रूप माँ ब्रह्मचारिणी, तप की पावन मूरत है,
श्वेत वस्त्र और शांत रूप, अति मनभावन ये सूरत है।
हाथ में माला और कमंडल, संयम का संदेश सुनाती,
सदाचार और ज्ञान का अमृत, जन-जन के भीतर भर जाती।
तृतीय रूप माँ चंद्रघंटा, मस्तक पर अर्धचंद्र साजे,
सिंह वाहिनी वीर रूप में, दसों दिशा में तेज विराजे।
घंटे की तीखी ध्वनि से, असुर और भय भागते दूर,
साहस का वरदान है देती, मिटाती संकट सारा क्रूर।
चतुर्थ रूप माँ कुष्मांडा, मंद हास्य से सृष्टि बनाई,
अंधकार को दूर भगाकर, इस जग में नव ज्योति जगाई।
अष्टभुजा धारी कल्याणी, सौरमंडल में जिनका वास,
आयु, यश और बल है देती, मिटाती मन का हर अवसाद।
पंचम रूप माँ स्कंदमाता, ममतामयी वात्सल्य का रूप,
गोद में कार्तिकेय विराजे, सिंह सवारी अति अनूप।
ज्ञान और बुद्धि की दाता, भवसागर से पार लगाती,
माँ की करुणा की छाँव में, हर एक आत्मा शांति पाती।
षष्ठम रूप माँ कात्यायनी, स्वर्ण कांति सा चमके गात,
कात्यायन की तपस्या का फल, महिषासुर का कीन्हा नाश।
धर्म की रक्षक, दुष्ट संहारक, पावन अस्त्र हाथ में धारे,
शीघ्र विवाह की बाधा हरती, जो भी इनको दिल से पुकारे।
सप्तम रूप माँ कालरात्रि, सघन अंधकार सा रूप भयंकर,
बिखरे बाल, गले विद्युत माला, काल भी काँपे देखकर।
दुष्टों के लिए महाकाल ये, भक्तों के लिए हैं शुभंकरी,
भूत-प्रेत और भय सब भागे, ऐसी हैं माँ मंगलकारी।
अष्टम रूप माँ महागौरी, श्वेत वस्त्र और गोरा वर्ण,
शिव की तपस्या करके पाई, पावन और निर्मल ये शरण।
वृषभ और डमरू हाथ सुशोभित, शांति-करुणा की हैं खान,
पाप मिटाकर जीवन महकाए, देती सुख-वैभव का दान।
नवम रूप माँ सिद्धिदात्री, सब सिद्धियों की हैं ये दाता,
कमल आसन पर हैं विराजमान, शिव भी शीश झुकाते माता।
लौकिक और पारलौकिक सुख की, यही कराती हैं अनुभूति,
नवरात्र के अंतिम दिन देतीं, पूर्ण ज्ञान और परम विभूति।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

