पद्यपंकज Bhakti,padyapankaj,Teachers Of Bihar,ToB PadhyaPankaj अंतर्ब्रह्माण्ड का दिव्य दीप – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

अंतर्ब्रह्माण्ड का दिव्य दीप – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर


Dharmendra Kumar Thakur

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अंतर्ब्रह्माण्ड का दिव्य दीप – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर

नभ मंडल का दृश्य-जगत तो स्थूल दृष्टि का रेला है,
किंतु पिंड के अंतस में एक सूक्ष्म जगत का मेला है।
मृत्तिका-पात्र के दीप तो केवल तिमिर बाह्य का हरते हैं,
पर अंतःकरण के द्वय दीपक, जीवन आलोकित करते हैं।
प्रथम दीप घृतकुमारी है, जो कंटक-शैया पर सजती,
किंतु मरुत के शुष्क क्षेत्र में पीयूष-धारा है भजती।
जब कायिक संताप दहकता, त्वचा झुलसती ज्वाला से,
यह ओषधि-दीपक शांत प्रवाल-सा, मुक्त कराता व्याला से।
यह शमन-शक्ति की अच्युत लौ है, जो विद्रधि को हरती है,
तिक्त वेश में सौम्य सुधा भर, काया कंचन करती है।
किंतु शीर्ष-घट के भीतर जो, परम ज्योति का वास यहाँ,
वह मस्तिष्क-प्रदीप्त महादीप, चेतना का अधिवास जहाँ।
कोटि-कोटि स्नायु-तंतु (न्यूरॉन्स) की विद्युत-वीथि जगमगाती,
जो प्रज्ञा, मेधा, बोध, विमर्श की नित्य ऋचाएं गाती।
जैसे घृतकुमारी का मज्जा, शारीरिक क्षय रोके,
त्यों मस्तिष्क का ज्ञान-पुंज, अज्ञान-निशा को टोके।
एक और जहाँ भौतिक वपु का, रक्षक और प्रदाता है,
अन्य वहीं इस सकल सृष्टि का, द्रष्टा और विधाता है।
जब मेधा का यह प्रज्ञा-दीपक, प्राकृत-दीप से मिलता है,
तब क्षर-अक्षर के संपुट में, मोक्ष-कमल यह खिलता है।
यह पिण्ड-ब्रह्माण्ड का महामिलन, प्रकृति का अनुपम कौतुक है,
जहाँ दृश्य और अदृश्य तत्त्व का, अंतर्संबंध अति अच्युत है।
एक ओषधि बन मृतप्राय देह में, नव-जीवन का रस घोल रही,
एक मेधा बन अंतस-अंबर में, सत्य-असत का पथ तोल रही।
घृतकुमारी की मज्जा जैसे, विषैले तत्त्वों का शमन करे,
त्यों मस्तिष्क का प्रज्ञा-प्रकाश, विकारों का निर्मूलन करे।
दोनों ही ‘दीपक’ इस वपु के, आत्म-रक्षण की परिभाषा हैं,
एक स्थूल स्वास्थ्य का संबल है, एक सूक्ष्म बोध की आशा है।
जब तक यह द्वय दीपक प्रदीप्त, यह मनुज-सृष्टि गतिमान रहे,
तन्वी काया नीरोग रहे, मन में संचित विज्ञान रहे।
इस अंतर्निहित ब्रह्माण्ड को जो, साधक पूर्णतः जान गया,
वह क्षर-अक्षर की सीमा लांघ, ईश-त्व को पहचान गया।

धर्मेंद्र कुमार ठाकुर। प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

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