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लड़ी रह गई – रामकिशोर पाठक


Ram Kishore Pathak

लेख सुनें तैयार

लड़ी रह गई- गजल
२१२-२१२-२१२-२१२

आँख ज्यों ही लड़ी फिर लड़ी रह गई।
मैं उसे वह मुझे देखती रह गई।।

यूँ उठाकर पलक देख तुझको लिया।
चाल मेरी रुकी की रुकी रह गई।।

हुस्न तेरा दिखा तो बुरा हाल है।
आँख मेरी खुली की खुली रह गई।।

जुल्फ से कुछ छिटककर गिरी गाल पर।
और जुल्फें तुम्हारी खुली रह गई।।

होंठ उसके हिले कान मेरे खुले।
साँस मेरी थमी की थमी रह गई।।

कत्ल उसने किया पर न कातिल बनी।
फैसला भी पड़ी की पड़ी रह गई।।

पाँव मेरे थमे बूत मैं बन गया।
ख्वाब सारी धरी की धरी रह गई।।

रचनाकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क – ९८३५२३२९७८

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