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॥ सुमति का वैभव ॥ – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।
जहाँ सुमति का वास है, वहीं लक्ष्मी का धाम,
सहमत होकर जहाँ पर, करते सब जन काम।
ईर्ष्या, छल और कपट का, होता जहाँ विनाश,
सुख-सम्पत्ति और शांति का, होता वहाँ प्रकाश।
एक तान में जहाँ पर, गूंजे मन के तार,
स्वर्ग उतर आता वहीं, महक उठता संसार।
वैभव केवल स्वर्ण का, होता नहीं निदान,
सच्ची सम्पत्ति प्रेम है, सच्चा है सम्मान।
मगर जहाँ पर फूट हो, मन में हो दुर्भाव,
बढ़ जाता है पलक में, विपदा का प्रभाव।
सोने का भी महल हो, अगर कुमति का साया,
क्षणभर में ढह जाएगी, वो झूठी माया।
बात पते की कह गए, तुलसी बाबा आज,
सुमति बिना सुधरेगा, कैसे अपना काज।
हाथ मिला कर चलिए, तजिए मन का वैर,
जहाँ सहमति मित्र है, वहाँ सम्पत्ति की ख़ैर।
मतभेदों की धूल को, मिलकर आज उड़ाएँ,
मन के सूने आँगन में, सद्भाव के दीप जलाएँ।
एक अकेला टूटता, जैसे तिनका कोई,
संग चले जो कारवाँ, विपदा दूर खड़ी रोई।
जब-जब मिलकर बैठते, सुर से मिलते सुर,
संकट के काले बादल, पल में होते दूर।
सहमति ही हर ताले की, बनती एक चाबी,
जहाँ सुमति का वास है, जीत वहाँ की लाबी।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

