आपका ब्राउज़र Text-to-Speech सपोर्ट नहीं करता।
वो बिहार वाला बचपन
पीपल की छइयाँ, बगिया की वो क्यारी,
वो अमरुद तोड़ना, वो मज़ेदारी।
याद आता है वो बिहार वाला बचपन,
सत्तू का शरबत और माँ का आँगन।
नंगे पाँव मिट्टी में वो दौड़ लगाना,
पकड़म-पकड़ाई में सारा दिन बिताना।
गंगा किनारे वो रेत के घरौंदे,
वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश के बूंदें।
लिट्टी-चोखा की सोंधी सी खुशबू,
दादी की कहानियों का अनोखा जादू।
लालटेन की रोशनी में वो पहाड़े रटना,
बिजली कटने पर छत पे वो लेटना।
छठ की वो रौनक, वो ठेकुआ का स्वाद,
घाटों के मेले, सब आते हैं याद।
साइकिल के टायर को डंडे से भगाना,
भरे दुपहरी में वो आम चुराना।
बड़े हो गए हम, पर वो सुकून खो गया,
शहर की भीड़ में मासूमियत सो गया।
काश! मिल जाए फिर से वही गलियाँ,
वही बचपन का खिलना, वही हँसती कलियाँ।
Barun Kumar


