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अहंकार की दुर्गंध
पैसा, पावर घूम-घूमकर, सबके माथे चूम रहा है. जिसे छू लिया इसने, उसका मन ही झूम रहा है।
धीरे-धीरे तन में उसके, ऐसा ज़हर समा जाता है, मानव का सीधा-सादा चेहरा, अहंकारी बन जाता है।
अहंकार की बू ऐसी है, दूर-दूर तक जाती है.
इत्र नहीं, यह दुर्गंध है, इंसानियत खा जाती है।
सावधान! ऐ मानव, इस छलावे में मत खो जाना, अपने भीतर के सेवक को , कभी न तुम सो जाने देना।
जिस दिन सेवा हार गई, उस दिन समझो हार हुई, मानवता की ज्योति बुझी, जीवन की अँधियार हुई।
कुछ लोग इस दुर्गंध को भी, शान समझकर जीते हैं, झूठे वैभव के नशे में, अपनों को ही पीते हैं।
पर इतिहास गवाह रहा है, घमंड कभी टिक पाया है?
जिसने सिर को ऊँचा समझा, वह धरती पर आया है।
जब-जब सत्ता मद में डूबी, सिंहासन हिल जाते हैं, अहंकार के ऊँचे महल, पल भर में दह जाते हैं।
दुर्गुण बढ़ते जाते हैं तो, सगुण दूर चले जाते हैं, दानवता के काले बादल, मानव पर छा जाते हैं।
थन भी जाता, मान भी जाता, यश भी साथ नहीं रहता, अंत समय में केवल अपना, कर्म ही साथ सदा रहता।
पूछ रहा हूँ आज सभी से-
विनम्र बनने में जाता क्या है? झुककर चलने वाला मानव,
आख़िर किससे हारता है?
फल से लदकर वृक्ष झुकें, नदियाँ झुककर बहती हैं,
झुकने वाली पावन धरती, सबका बोझा सहती है।
फिर इंसान ही क्यों अपने अहं में अंधा हो जाता है?
पैसा, पावर, पद के पीछे, अपना ईश्वर खो जाता है।
याद रखो-
पैसा जाएगा, पद जाएगा, सत्ता भी मिट जाएगी,
लेकिन सेवा की सुगंध, युगों-युगों तक आएगी।
इसलिए धन का नहीं, मन का अमीर बनो;
पद का नहीं, चरित्र का वीर बनी।
अहंकार नहीं-विनम्रग्रता अपनाओ, इंसान बनो, और इंसानियत बचाओ !
चन से नहीं, व्यवहार से पहचान बनाइए: पद से नहीं, सेवा से सम्मान पाइए।
अहंकार का अंत सदा विनाश है,
विनम्रता ही मनुष्य का सच्चा प्रकाश है।
Umesh Kumar Sinha


