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यात्रा का आनंद – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।
लकीरें हाथ की धुंधली, भाग्य का पता क्या है?
जो कल होना है वो होगा, भला इसमें शिकायत क्या है?
पवन के वेग में बहना है, यात्रा का आनंद लेना है,
किसे परवाह है क्या होगा, यहाँ खोना ही क्या है?
दिलों में भय क्यों पालें, कि कल लक्ष्य मिलेगी या नहीं,
यह मार्ग सुंदर हैं, इस यात्रा में हम अकेले तो नहीं।
जो बीत गया वो स्वप्न था, जो आएगा वो अनजाना,
इसी इक क्षण में जीना है, यही बस एक ठिकाना।
संसार के बंधन छोड़ो, कि वो क्या सोचता होगा,
यहाँ हर व्यक्ति अपने ही विचारों में उलझता होगा।
मित्र! खुलकर ज़रा हंस लो, समेटो आज की खुशियाँ,
कल की चिंता में क्यों खोएं, हम अपनी आज की घड़ियाँ।
पक्षी कब रुकते हैं, समझकर कल का सन्नाटा,
वो गाते हैं हर्ष के गीत, भूलकर हर कोई काँटा।
चलो हम भी उड़ान भर लें, बिना परिणाम की परवाह किए,
जलाएं आज की सभा को, आशाओं के दीपक लेकर जिए।
बहती नदिया कभी न रुकती, बाधाओं से क्या डरना है,
आगे ही आगे बढ़ना है, रुककर यहाँ क्या करना है।
सागर से मिलने की चाहत, हर पल एक नई आशा है,
बिना रुके चलते जाना ही, जीवन की परिभाषा है।
मन का धीरज कभी न खोना, व्यर्थ चिंता में क्या रोना है,
जो विधाता ने लिखा है, वही यहाँ पर होना है।
क्षणभंगुर यह जीवन सारा, बहती समय की धारा है,
आज जिए जो हर्ष से खुलकर, वही सिकंदर हमारा है।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

