चंचल मन
चंचलता की लहर उठती, अर्जुन ने केशव से कहा,
“हे कृष्ण! यह चंचल पवन सा मन कभी थमता नहीं,
बलवान है, हठीला है, विकट इसकी धार है,
वश में इसे करना प्रभो, जैसे हवा को बांधना दुश्वार है।”
मुस्कुराकर तब सारथी ने पार्थ का संशय हरा,
कहा, “सत्य है कुन्तीपुत्र, यह मन सदा ही है चला,
पर सुन शूरवीर! जो जीत ले इस द्वंद्व को,
मन मित्र है उसका, जो थाम ले इस वेग को।
पर जो हार जाता, हारता वो जंग है,
दुश्मन बना यह मन स्वयं ही, शत्रुता के रंग है।
भटकेगा ये पग-पग यहाँ, तृष्णा इसे तरसाएगी,
इन्द्रिय-जगत की वासना हर पल इसे भरमाएगी।”
पूछा धनुर्धर ने तब, “उपाय क्या इसका प्रभो?”
माधव बोले, “दो ही मार्ग हैं, एकाग्र तू अब हो,
पहला ‘अभ्यास’ का, जो निरंतर प्रयास सिखाएगा,
गिरकर दोबारा उठने का विश्वास जगाएगा।
दूजा है नाम ‘वैराग्य’ का, जो मोह से मुक्त करेगा,
आसक्ति के इस जाल से, मन को विरक्त करेगा।
जब-जब भटक कर दूर जाए, डोर इसकी खींचना,
लौटा के इसको आत्म में, निज सत्य को ही सींचना।”
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
Dharmendra kumar Thakur


