पिता के संरक्षण में पुष्पित-पल्लवित,
माता के संस्कारों के साँचे में ढली,
लाड़ला हो या सुश्री लाड़ली,
अपने चंचल चितवन से रिझाकर,
हम सभी को भरमाकर, पता नहीं,
अपनी साँसों को समेट इस दुनिया से
पिंड बनकर कहाँ ओझल हो जाते हैं।
अपनी मीठी अदाओं से फुसलाकर,
जाने कहाँ अचानक गायब हो जाते हैं,
छोड़ जाते हैं अपनी सुगंधित आवाज़ों की तस्वीर,
रूठने-मनाने के वे दृश्य,
जाने का कारण, दुःख-सुख बिन बताए,
अचानक! फिर कभी न रहने, न मिलने का
विदा माँग लेते हैं।
हवा में विलीन हो, छाया बन,
हमें तड़पाते, तरसाते हैं,
देखकर वे मजबूर हो जाते हैं—
क्या कर पाते हैं?
काश! उनकी वह खबर पहले होती,
तो उनका पूरा समाधान मिला होता।
सूना हुआ जहाँ अधूरा रह गया,
संघर्ष—ज़िंदगी का सहायक—बिना अधूरा है।
बिन बताए, समझाए जाना भी तो
पिछले दृश्य की अनुभूति की पीड़ा है।
जा रहे हैं, जाएँ—विनम्र श्रद्धांजलि देता हूँ।
आपकी इंसानियत की महाशक्ति से
स्वर्ग का दरवाज़ा अपने आप खुले,
स्वर्ग में आपको असीम शांति और सुख मिले।
और फिर स्वर्ग से लौटकर हम सभी के बीच
असीम शक्ति बन यहाँ आने की आशा करता हूँ।
स्वर्गदेवता से आपके खातिर यहाँ पर फिर लौट आने का
अद्भुत कर्म करता हूँ।
रास्ते में कहीं कष्ट न हो—
दुआ यह मैं करता हूँ।
स्मृतियों को सँजोए रखता हूँ,
विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
स्वरचित मौलिक रचनाकार:
उमेश कुमार सिन्हा ‘निर्देशक’
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल रघुनाथपुर
तुलसी पथ लालापुल रघुनाथपुर
अंचल – ब्रह्मपुर, जिला – बक्सर

