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🌺 अध्यात्म और विज्ञान 🌺-धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।
ऋषियों ने जो ध्यान में देखा, प्रयोगशाला मानती,
परम सत्य जो विष्णु पुराण का, आज चेतना जानती।
मुनि पराशर कह गए जिसको, “नारायण हर एक कण”,
विज्ञान उसी को ‘ऊर्जा’ कह, नमन कर रहा प्रति-क्षण।
अविनाशी अविराम चेतना, नष्ट कभी यह हो न सके,
बदले रूप निरंतर अपना, बंधन में कोई न रखे।
विष्णु पुराण की ‘महामाया’ ही, ‘वैश्विक तंत्री धार’ बनी,
‘सूक्ष्म-क्षेत्र’ महाविष्णु है, जिससे सृष्टि अपार बनी।
‘परम-बिंदु’ से ही प्रकटे, ब्रह्मा रचने को संसार,
‘महाविस्फोट’ का आदि-अंत ही, फैलाता ब्रह्मांड विस्तार।
पालक शक्ति जो महाविष्णु की, बाँध रही ब्रह्मांड को,
गुरुत्वाकर्षण और ‘देश-काल’, थामे हर पिंड-खंड को।
रुद्र रूप संहारक ऊर्जा, खींच रही सब भीतर आज,
‘कृष्ण-विवर’ के महा-सत्य को, सदियों पहले समझी लाज़।
सृष्टि, स्थिति और प्रलय चक्र में, ‘सापेक्षता’ का ही गान,
ब्रह्मा का एक पल पृथ्वी के, जुग-जुग जैसा है बलवान।
बदल रही गति काल चक्र की, समय का यह अद्भुत खेल,
ज्ञान-विज्ञान अध्यात्म का देखो, कैसा सुंदर पावन मेल।
‘जैविक-लय’ को गहरी समझो, ‘ब्रह्ममुहूर्त’ का पावन राज,
‘शिरो-ग्रंथि’ के ‘स्राव-तत्त्व’ ही, करते तन पर सुंदर काज।
उषाकाल में जाग जीव जब, ‘जैविक-घड़ी’ को सेट करे,
ऋषियों का यह गुप्त नियम ही, तन-मन में ऊर्जा को भरे।
नकारात्मक तरंगें होतीं, निशा-काल में अधिक महान,
श्मशान और सूने रास्तों पर, ‘विकिरण’ का है विज्ञान।
कर्म-फल का नियम सिखाता, निर्बल को न कभी सताना,
मर्यादा में जीने से ही, ‘जीव-जगत’ को महकाना।
दृश्य जगत यह ‘छाया-दर्शन’, माया का भ्रमजाल जिसे कहा,
जिस ‘तंतु-वाद’ को खोज रहे, वह सत्य पुराणों में था रहा।
पदार्थ तो बस एक धोखा है, भीतर केवल स्पंदन-तंग,
जान गया जो गूढ़ सत्य यह, मोक्ष-अमृत पाया वह अंग।
विज्ञान और अध्यात्म एक हैं, दो राहों का एक ही छोर,
परम सत्य की खोज हो रही, भीतर से बाहर की ओर।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर।
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

