कर्मठता का प्रतीक बेटी है,
बेटी घर की शान।
माँ की गृहस्थी में सहयोगिनी,
पापा की पगड़ी की शान।
एक तरफ माँ का दर्द संभाले,
दूसरी तरफ पिता की आर्थिक मजबूरी,
पिता की रौनक बनी रहे,
करती दिन-रात देखरेख पूरी।
खुद पुस्तकालय से पुस्तकें लेकर,
कर लेती उच्च से उच्चतर शिक्षा पूरी।
पिता का मुझसे नाम हो,
पिता का बढ़े सम्मान,
ले लेती अपनी प्रतिभा से
सम्मानजनक नौकरी महान।
ऐसी हैं आज की बेटियाँ,
जो घर के आर्थिक-सामाजिक
संस्कारों की राह पर चलकर,
कर्तव्य की कसौटी पर उतरती हैं खरी।
माँ-पिता के सपने संजोती,
उनमें ढाढ़स बंधाती हैं,
भाई-बहन के साथ-साथ
माँ-पिता के खान-पान और
पहनावे का भी ध्यान रखती हैं।
अच्छे-अच्छे, बदल-बदलकर
अपनी पसंद का चुनाव करती हैं,
बेटियाँ घर की खुशियों में
अपना संसार सजाती हैं।
बिन बेटी के घर नहीं सोहे,
बिन कन्यादान के धर्म नहीं होय।
बेटी घर की शान बढ़ाए,
माता-पिता का मान बढ़ाए।
अपने कर्म और प्रतिभा से
कुल का नाम रोशन करती है,
बेटी बनकर जन्म लिया है,
परिवार से देश तक की ताकत बनती है।
बेटी है घर की खुशहाली,
बेटी ही घर का मान।
माता-पिता के सपनों को
देती है नई उड़ान।
संस्कार, शिक्षा और कर्मठता से
रोशन करती कुल, देश का नाम,
बेटी से ही घर-आँगन के साथ स्वदेश में
बसता सुख, सम्मान और मुस्कान ।
उमेश कुमार सिन्हा ‘निर्देशक’
डिसेंट एकेडमी वाया स्कूल, रघुनाथपुर
तुलसीपथ, लालापुल, रघुनाथपुर
अंचल—ब्रह्मपुर, जिला—बक्सर

