धरती मइया पुकारे हई, सुनऽ हो मनई के लाल,
हरियर-हरियर जंगल बचइहऽ, मत करऽ इनकर हाल।
नदिया, पोखर, आहर-पइन, सभे हमर अनमोल,
इनकर निर्मल जल में बसऽ हे, जीवन के मीठ बोल।
पेड़-पौधा हई धरती के, साँचो अनमोल गहना,
इनका बिना बतावऽ भइया, जिनगी के का रहना?
पीपर, बरगद, नीम लगइबऽ, आम-अमरूद के बाग,
चिरई-चुरगुन गीत सुनइहें, दूर होई सब लाग।
कटत पेड़ के देख के, मनवा हो जाला उदास,
छाँह कहाँ से पइबऽ भइया, जब ना बचत वनवास?
आज लगइबऽ नन्हक पौधा, काल्हि बनी दरख्त,
पीढ़ी-दर-पीढ़ी छाँह देई, ई हमनी के कर्तव्य।
नदिया में कचरा मत फेंकऽ, पोखर मत करऽ गंदा,
जल हई जीवन के आधार, जल बिन जीवन मंदा।
बूँद-बूँद के मोल समझऽ, पानी खूब बचइबऽ,
बरखा के पानी रोक-रोक के, धरती के प्यास बुझइबऽ।
धुआँ-धूल से हवा बिगड़ल, साँस-साँस में पीरा,
साफ हवा खातिर अब तऽ, बदलऽ अपना तरीका।
साइकिल चलइबऽ, पेड़ लगइबऽ, कम करबऽ धुआँ,
स्वच्छ हवा जब साँस में आई, खिल उठी सबकी मुँहा।
प्लास्टिक के थैली छोड़ऽ, कपड़ा के थैला लऽ,
कचरा जहाँ-तहाँ मत फेंकऽ, डिब्बा में डालऽ भइया।
गीला-सूखा कचरा अलग करऽ, ई आदत खूब बनावऽ,
अपना घर से शुरू करीं, गाँव-टोला चमकावऽ।
धरती खाली खेत न हई, धरती माई हई हमार,
माटी, पानी, पेड़-पखेरू—सभे पर हक समान।
चिरई के दाना-पानी देबऽ, जीव-जंतु के बचइबऽ,
प्रकृति के हर रूप के अब, अपना मान समझइबऽ।
बच्चा-बच्चा हाथ बढ़ावऽ, शिक्षक दे संदेश,
हरियाली से सुंदर होई, अपना गाँव-प्रदेश।
एक पौधा अपने नाम के, एक पौधा माई के,
एक पौधा उन वीरन खातिर, जे गइलें देश बचाई के।
आओ मिलके शपथ उठइबऽ, धरती रखबऽ सँवार,
जल-जंगल-जमीन बचइबऽ, ईहे साँचो प्यार।
आज नन्हक बीज बचइबऽ, काल्हि बने संसार,
धरती के हरियाली खातिर, बनऽ प्रकृति-प्रहरी हमार!
पेड़ बचावऽ — पानी बचावऽ,
जीवन के मुस्कान बचावऽ।
धरती मइया के मान बढ़ावऽ,
आवऽ मिलके प्रकृति बचावऽ!
सुनील कुमार प्रजापति, प्रधान शिक्षक
नवसृजित प्राथमिक विद्यालय इमामगंज, ओबरा, औरंगाबाद, बिहार

