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धरती मइया के रखवार
हम हिअइ प्रकृति के प्रहरी,
धरती मइया के रखवार,
पेड़-पात, नदिया अउर पहाड़,
ई सब हइ जिनगी के आधार।
धरती मइया रोवत हथिन,
देख के मनई के व्यवहार,
काट-काट के पेड़ गिरावऽ ह,
उजड़ रहल चिरई के संसार।
कोयल के कुहुक, पपिहरा के बोल,
अब काहे सुनाई न दे हइ?
जंगल-झाड़ उजड़ गेलई,
चिरई के बसेरा कहाँ रहे हइ?
नदिया के पानी मैला हो गेलई,
पोखरा के छाती सूख रहलई,
कल-कारखाना के जहरवा से,
हवा के दम घुट रहलई।
अरे मनई! अब तऽ चेतऽ,
काहे बनल हऽ अन्हार?
प्रकृति के छाती चीर-चीर के,
कइसे बसतऽ सुख के संसार?
एकह गो पेड़ लगइबई,
सुखल धरती के हरियर बनइबई,
नदिया, पोखर,आहर,पईन,
मिल जुल के सबके बचइबई।
इहे संकल्प आज लेइत हिअई,
कभी प्रकृति से खिलवाड़ न करबई।।
जय प्रकृति। जय धरती मईया।।
सुनील कुमार प्रजापति, प्रधान शिक्षक
नवसृजित प्राथमिक विद्यालय इमामगंज, ओबरा, औरंगाबाद, बिहार

