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धुएँ में उड़ती ज़िंदगी – धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
धुएँ के छल्लों में छुपा है, देखो मौत का सामान,
नादान इंसान समझ न पाए, खो देता अपनी जान।
एक छोटी सी सिगरेट में, कैसा ज़हर समाया है,
इसने न जाने कितने ही, हंसते घरों को मिटाया है।
चार हज़ार रसायन मिलकर, सांसों को थकाते हैं,
अंदर ही अंदर ये हमारे, फेफड़ों को सुलगाते हैं।
दो सौ ज्ञात विष हैं इसमें, जो नस-नस में बहते हैं,
जीते-जी इंसान को ये, हर पल दुर्बल करते हैं।
साठ एजेंट ऐसे छिपे हैं, जो कैंसर को लाते हैं,
स्वस्थ और सुंदर जीवन को, मिट्टी में मिलाते हैं।
छोड़ो सिगरेट, चुनो ज़िंदगी, यह संदेश फैलाना है,
अपने स्कूल और समाज को, व्यसन-मुक्त बनाना है।
क्षणिक मजे की खातिर क्यों, जीवन दांव पर लगाते हो,
अनमोल मिली है जो सांसें, क्यों धुएँ में उड़ाते हो?
माता-पिता की आँखों के, तुम तारे हो और आशा हो,
बीमारी को गले लगाकर, मत बनो तुम तमाशा हो।
कलियों जैसे मासूम हो तुम, महकना तुमको जीवन में,
ज़हर घोलकर मत डालो, बाधा अपने ही बचपन में।
आओ मिलकर कसम ये खाएं, नशे को दूर भगाएंगे,
स्वस्थ, सुरक्षित और जागरूक, एक नया सवे
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया

