आपका ब्राउज़र Text-to-Speech सपोर्ट नहीं करता।
द्वितीयं ब्रह्मचारिणी – अरविंद मिश्र “नीरज “
ज्योतिर्मय अति भव्य भवानी, माँ दुर्गाकेर दोसर रूप।
परम तपस्या के प्रतिफल माँ, ब्रह्मचारिणी नाम अनूप।।
बड़ -बड़ ऋषिगण मुनि जन मन-मन,
देखि तपस्या चकित भेलाह।
धैर्य प्रबलकेँ देखि योगिजन,
सकल महाजन थकित भेलाह।
नीलकमल सन युगल नयन नित दमकै सुंदर सुभग स्वरूप
परम तपस्या के प्रतिफल माँ , ब्रह्मचारिणी नाम अनूप।।
दहिन हाथमे जपमाला माँ,
बाम कमण्डल राजित हे।
सगर अंगमे पुष्प कमल केर,
अलंकार अति शोभित हे
स्वर्ण मुकुट सिर चम-चम चमकै, प्रखर सूर्यकेर जहिना धूप
परम तपस्या के प्रतिफल माँ, ब्रह्मचारिणी नाम अनूप।।
एहन रूप केर हे माँ दुर्गा,
भक्त कियो जौं ध्यान धरय।
बुद्धि विवेक धैर्य सम्बल सँ,
ओ जन जगमे सफल हुय।
सकलसिद्धि माँ शीघ्र भेटै अछि,ओने खसय अज्ञानक कूप
परम तपस्या के प्रतिफल माँ, ब्रह्मचारिणी नाम अनूप।।
रचना
अरविंद मिश्र “नीरज ” (कवि जी), सहरसा

