कर्त्तव्यपरायण और व्यवहारकुशल बनना,
स्वयं के प्रति सत्यनिष्ठ-ईमानदार बनना,
निरंतर सीखना, जिज्ञासु बनना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखना,
प्रगति के लिए सदा संघर्ष करना, तार्किक दृष्टिकोण रखना,
अपने काम से सदा प्रेम करना, उसे लगन, निष्ठा से करना,
उच्च ध्येय को लक्ष्य बनाना, प्रतिबद्धता से उसे प्राप्त करना,
बड़े कार्यों में स्वयं को निमित्त मानना, और यश प्राप्त करना,
स्थितप्रज्ञ और स्वयं में स्थित होकर निरंतर कार्य करते रहना,
विषय-क्षेत्र, कार्य-क्षेत्र, परिवार, समाज, राष्ट्र को क्या दे सकूं,
यह ऊंची भावना हृदय और अन्तरात्मा में तुम सदा रखना,
पर्यावरण के हित और सबके हित में वृक्षारोपण, वृक्ष-संरक्षण करना,
अपने पैतृक सम्पत्ति और उच्च जीवन-मूल्यों की सदा रक्षा करना,
ईश्वर में आस्था रखते हुए निरंतर कर्म करना, कर्त्तव्य-कर्म करना,
बिना अभिमान परोपकार करना, हृदय में परोपकारी भावना रखना,
अपने जीवन के दीर्घ पथ को देख अपनी जीवन-यात्रा पर ध्यान केंद्रित करना,
जीवन सहज, अर्थपूर्ण, पवित्र और परोपकारमय हो, यह सदा ध्यान रखना,
विद्वज्जनों के अनुभवों, अपने ज्ञान – अनुभवों से निरंतर आगे बनना,
अपने कर्म-क्षेत्र में सदा कार्यकुशल बनना, निरंतर कार्य करना,
लोक में अपकीर्ति से डरना, अपकीर्ति केवल बुरे काम से बचाए,
यदि यह हमारे मार्ग की बाधा बने तो इससे कदापि न डरना,
जीवन लंबा नहीं, महान होना चाहिए, यह सदा ध्यान रखना,
विस्तार ही जीवन है और संकुचन ही मृत्यु, यह ध्यान रखना,
अपने सत्कार्यों द्वारा अपने जीवन में अमिट छाप छोड़ना,
जीवन कितना जीयें, इसका नहीं महत्त्व, जीवन कैसे जीयें, यही तत्व अमरत्व, यह सदा ध्यान रखना ।
गिरीन्द्र मोहन झा

