अन्तर्मन में चल रहे ,
असंख्य द्वन्द्व को देखती स्त्री
पूछती है खुद से एक सवाल ,
कौन हूँ मैं ?
क्या है मेरा अस्तित्व ?
क्या यही कि मुझे
पुरूष सत्तात्मक समाज में ,
गमले के वटवृक्ष की
तरह उगाया गया है ?
जिसकी कोमल टहनियाँ ,
जड़ें और कोपलें
वक्त वक्त पर खूबसूरती ,
से छाँटी जाती हैं…..
ताकि बनी रहूँ अपनी मिट्टी से
और गहरे तक न उतर सकूँ ,
पर ….
मेरी जड़ें तो सभ्यता के
शुरुआत से ही, मिट्टी की
गहराइयाँ खो चुकी है …..
मेरी संवेदनारूपी टहनियाँ भी
कब की काटी जा चुकी है …..
मेरी कोमल, स्निग्ध
अभिव्यक्ति की कोपलें भी ,
कबकी नोची- खसोटी जा चुकी है …..
पता ही नहीं चला कब
मेरे हिस्से की जमीं ,
मुझसे छीनी गयी और
मेरे हिस्से का आसमान भी,
रेत की मानिंद मुट्ठी से फिसल गया ….
और , संवेदनाशून्य बन
अंतस में धधकते अग्निकुंड लिए ,
रह गयी इस आभासी दुनिया में
जहां मेरी टहनियों और शाखाओं को
सिर्फ सज्जा के रूप में रखा जाने लगा …..
बेबी अर्चना
मध्य विद्यालय कुआड़ी
प्रखंड कुर्साकांटा जिला अररिया

