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ईश्वर की अद्भुत रचना



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     ईश्वर की अद्भुत रचना और इंसान का भटकाव
सृजनहार ने बड़े चाव से, एक सुंदर संसार रचाया,
कण-कण में जीवन फूंका, हर रूप को खूब सजाया।

अम्बर को दी असीम ऊँचाई, धरती पर हरियाली बोई,
पाताल की गहराइयों में भी, कोई कमी न रहने दी कोई।
नदी, पहाड़, हवा और पंछी, सबने उसका हुक्म बजाया,
फिर इन सबसे सुंदर उसने, एक नया रूप बनाया।
हमें बनाया, तुम्हें बनाया, देकर अद्भुत काया,
धरा का वो सबसे प्यारा जीव ‘मनुष्य’ कहलाया।
सब जीवों में श्रेष्ठ किया, बुद्धि का वरदान दिया,
ज्ञान और विज्ञान सिखाकर, जग में ऊँचा नाम दिया।
सिखलाए संस्कार सभी, और मानवता का पाठ दिया,
कर्तव्य पथ पर चलने का, एक सीधा-साफ़ मार्ग दिया।पर ऐ इंसान! तूने यह कैसी धूर्तता अपनाई?
प्रपंच के काले साये में, तूने अपनी बुद्धि गँवाई।
जान-बूझकर बना अनजान, तूने अपनों को ही लूटा है,
कदम-कदम पर, डगर-डगर पर, मचाया उधम झूठा है।
धोखा देना कहाँ से सीखा? कहाँ से सीखी यह चतुराई?
मर्यादा की हर एक सीमा, तूने आज पार कर आई।
भूल गया तू उस ईश्वर को, भूल गया इंसानियत की रीत,
स्वार्थ के वश में होकर तूने, गाए केवल छल के गीत।
वक़्त है अब भी संभल जा बंदे, लौट आ कर्तव्य के राह पर,
रचना जिसकी तू सुंदर है, दाग न लगा उसकी चाह पर।ज़रा सोच, जब अंत समय में तू उस सृजनहार के सम्मुख जाएगा,
अपनी इन चालाकियों का, वहाँ क्या हिसाब बतलाएगा?
जिस माटी से तू जनमा है, उसी माटी में मिल जाना है,
साथ न जाएगी यह दौलत, खाली हाथ ही जाना है।
तूने नोंच लिया इस धरती को, नदियों का लहू बहाया है,
तरुवर की छांव को बेच-बेच, कंक्रीट का महल बनाया है।
मासूमों की आहों पर तूने, अपना यह महल उठाया है,
पर याद रख, हर एक चीख का, ऊपर लेखा-जोखा पाया है।
जिस बुद्धि से ब्रह्मांड नापना था, उससे तूने जाल बुना,
अपनों की ही गर्दन काटने को, तूने नफ़रत का हथियार चुना।
सो गई है क्या आत्मा तेरी? या ज़मीर तूने बेच दिया?
चंद पैसों की खातिर बंदे, तूने इंसानियत को छोड़ दिया?
अब भी जाग, ओ भटके मानव! इस आत्म-मोह की निद्रा से,
वरना पछतावा भी कम पड़ेगा, जब गिरेगा तू अपनी ही नजरों से

  •                       धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
                     प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
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Dharmendra kumar Thakur

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