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लालच की अंतहीन गर्त
यह सूक्ष्म सुई के छेद जैसी, दिखती छोटी इक थैली है,
पर इसके भीतर छिपी हुई, इक दुनिया महा-विषैली है।
मत पाल इसे ओ सीधे मन, यह काल-दंश से काली है,
जिसने भी इसको हाथ छुआ, उसकी हर सांस संभाली है।
इसका मुख तो अति छोटा है, पर उदर थहाए थहता नहीं,
ब्रह्मांड समूचा निगल जाए, फिर भी यह तृप्त सरिता नहीं।
सात समंदर पी डाले, नौ लाख सितारे चबा जाए,
दशदिश की सारी दौलत भी, इस गहरे पेट में समा जाए।
धरती का सारा स्वर्ण-कोष, अंबर का सारा वैभव भी,
इसके सम्मुख है तुच्छ बड़ा, फीका पड़ता हर गौरव भी।
इतिहास निगलती आई है, भूगोल चबाने बैठी है,
यह ऐसी दानव-थैली है, जो खुद यमराज से ऐंठी है।
हर घोर कुकर्म, कुत्सित करतूत, इसमें चुपचाप समा जाती,
हर महापाप की काली नदी, इसके भीतर ही खो जाती।
पर तृप्ति का कोई छोर नहीं, यह बढ़ती ही जाती पल-पल,
इंसान तो क्या, यह देवों का भी, हर लेती है धीरज-बल।
संसार थमे, आकाश फटे, पर इसकी भूख न मिटती है,
यह लालच की वह माया है, जो सृजन को प्रलय में बदलती है।
कुछ पाकर भी रीती है, यह कभी न भरने वाली है,
जिसने भी इससे प्रीति करी, उसकी ही झोली खाली है।
यह महलों को पल भर में ही, मरुस्थल की रेत बनाती है,
इंसान के भीतर के मानव को, पल-पल नोच चबाती है।
भाई से भाई को बांटे, यह रिश्तों का कत्लेआम करे,
ईमान धरम सब बेच-बेच, औलादों को बदनाम करे।
सोने के पिंजरे में रखकर, यह सुख का पंछी मार रही,
संसार जीतने निकले को, खुद के ही हाथों हार रही।
सब वैभव यहीं धरा रहेगा, जब कफ़न ओढ़ना पड़ता है,
सिकंदर जैसा महाबली भी, खाली हाथों ही जाता है।
संतोष ही वो अमृत घट है, जो इस तृष्णा को हरता है,
जो पा लेता संतोष धन, वो जग में राज करता है।
धर्मेंद्र कुमार ठाकुर
प्राथमिक विद्यालय रेही टोला
रानीगंज अररिया
07.10.2026

