तितली का छोटा शुभ बचपन – रामपाल प्रसाद सिंह अनजान
छोटा जीवन व्यर्थ नहीं है।
हमसे अच्छा अर्थ कहीं है।।
पल-पल में आनंद लुटातीं,
जग-जीवन में धक-धक स्पंदन. ….
तितली का छोटा शुभ बचपन….
बड़ी उम्र मेरे हैं अपने।
मन के अंदर आते सपने।।
सोया होता हूँ अब भी मैं,
जिंदा होता है पागलपन…
तितली का छोटा शुभ बचपन….
इंद्रधनुष पर्याय तुम्हारा।
मोर नृत्य तुम जैसा प्यारा।।
जुगनू भकभक स्वर्ग सरीखे।
भाद्र महीना दुर्लभ दर्शन…
तितली का छोटा शुभ बचपन….
होते हो तुम रंग-बिरंगे।
आदत हम सबके बेढ़ंगे।।
नहीं कभी तुम रंग बदलते
रंग बदलते मेरे उलझन….
तितली का छोटा शुभ बचपन….
बचपन की मीठी यादों को।
किए मित्र आपस वादों को।।
लहूलुहान किए थे पहले,
अनुभव से आयी है भटकन…
रामपाल प्रसाद सिंह अनजान

