नैन व्यथित थें दर्श हुआ है।
मिलकर मुझको हर्ष हुआ है।।
अब पूनम सी लगे अमावस।
क्या सखि? साजन! न सखी? पावस।।०१।।
मुझे जलाती थी पुरवाई।
राह निरखते दिवस बिताईं।।
मिलकर उसने दी है ढाढस।
क्या सखि? साजन! न सखी? पावस।।०२।।
विरह आग में मैं जलती थी।
अक्सर दिन रैन मचलती थी।।
उनसे मिली बनी मैं सारस।
क्या सखि? साजन! न सखी? पावस।।०३।।
भूल गई थी मैं तो सोना।
डर था पड़े न जीवन खोना।।
उनसे मिली खिली बन आरस।
क्या सखि? साजन! न सखी? पावस।।०४।।
मन में छाई लाचारी थी।
तन में जैसे बीमारी थी।।
मुझे छुआ वह जैसे पारस।
क्या सखि? साजन! न सखी? पावस।।०५।।
रचनाकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क – ९८३५२३२९७८

