पद्यपंकज Prem पावस-राम किशोर पाठक 

पावस-राम किशोर पाठक 


Ram Kishore Pathak

नैन व्यथित थें दर्श हुआ है।

मिलकर मुझको हर्ष हुआ है।।

अब पूनम सी लगे अमावस।

क्या सखि? साजन! न सखी? पावस।।०१।।

मुझे जलाती थी पुरवाई।

राह निरखते दिवस बिताईं।।

मिलकर उसने दी है ढाढस।

क्या सखि? साजन! न सखी? पावस।।०२।।

विरह आग में मैं जलती थी।

अक्सर दिन रैन मचलती थी।।

उनसे मिली बनी मैं सारस।

क्या सखि? साजन! न सखी? पावस।।०३।।

भूल गई थी मैं तो सोना।

डर था पड़े न जीवन खोना।।

उनसे मिली खिली बन आरस।

क्या सखि? साजन! न सखी? पावस।।०४।।

मन में छाई लाचारी थी।

तन में जैसे बीमारी थी।।

मुझे छुआ वह जैसे पारस।

क्या सखि? साजन! न सखी? पावस।।०५।।

रचनाकार:- राम किशोर पाठक 

प्रधान शिक्षक 

सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।

संपर्क – ९८३५२३२९७८

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