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गुरु- दोहा मुक्तक – राम किशोर पाठक
ज्ञान चक्षु जो खोलते, हरे तमस मन ताप।
कर प्रशस्त पथ शिष्य का, निश्छल मन रख आप।
सर्व श्रेष्ठ सह सत्य का, गुरु दिखलाते मार्ग-
गुरु पद की कर वंदना, शिष्य बनें निष्पाप।।०१
अंधकार से ले चले, जो प्रकाश की ओर।
जिसके हर सानिध्य से, आती है नव भोर।
परम पूज्य श्रद्धेय गुरु, नमन करो स्वीकार-
कृपा शिष्य पर हो सदा, नमन करूँ कर जोर।।०२।।
गत आगत का ज्ञान दे, गुरु करते उपकार।
श्रद्धा जिसके हिय बसे, शिष्य करे आभार।
गुरु ईश्वर से श्रेष्ठ हैं, करिए प्रथम प्रणाम-
त्रिविध ताप का कर शमन, करें सहज भव पार।।०३।।
रचनाकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क- ९८३५२३२९७८

