सज्जन कैसे जी सके- दोहा छंद गीत
भ्रष्टाचारी बोलते, करके हर-पल शोर।
सज्जन कैसे जी सके, बने नहीं जो चोर।।
पग-पग बाधा कर खड़ी, देते सभी तनाव।
मीठी वाणी से वही, रखते सतत् लगाव।।
सज्जन उर समझे नहीं, दुनिया की यह चाल।
चुभता रहता शूल नित, किसे बताए हाल।।
कहते चलिए संग में, ले जाए जिस ओर।
सज्जन कैसे जी सके, बने नहीं जो चोर।।०१।।
ताकत उनके पास है, संख्या पैसा संग।
एक अकेला हो रहा, हर-पल इनसे तंग।।
ऐसे-ऐसे पैंतरे, अपनाते सब ढंग।
व्याकुल होता सत्य तब, धूमिल हो हर अंग।।
मायूसी भरता सदा, चले नहीं जब जोर।
सज्जन कैसे जी सके, बने नहीं जो चोर।।०२।।
मदद नहीं कोई करे, सभी निकालें दोष।
क्यों भिड़ते हो तुम सदा, दिखलाते सब रोष।।
नैतिक बातें पाठ में, फिर क्यों पढ़ते लोग।
जिसको सारे त्यागकर, खोज रहे बस भोग।।
रैना काली कब छँटे, कब आएगी भोर।
सज्जन कैसे जी सके, बने नहीं जो चोर।।०३।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क – ९८३५२३२९७८

