आज झुकेगी विनयी डाली।
जेष्ठ अमावस दिन पावन को।क्या कहने मन के सावन को।।
भोर हुई छाई खुशियाली।आज झुकेगी विनयी डाली।।
जीव-जंतु सब हर्षित जग में।स्वर्ग-सरीखे छाये मग में।।
धूप-सिंदूर अक्षत सारे। दूर भगाए मन के कारे।।
कुमकुम रोली थाल सुशोभित।खनक चूड़ियाँ बिंदी मोहित।।
नवल शांति चहुँदिश मुस्काई।रंग-बिरंगी छवियाँ छाई।।
घर से बाहर दूर चली हैं।शुभिता अंतस विमल फली है।।
मन के कोना शुभ संचारित।नार चली सोलह श्रृंगारित।।
सावित्री शुभ व्रत संकल्पित।यथा शक्ति स्वागत में अर्पित।।
ब्रह्मा विष्णु महेश प्रकट हैं। फलदाई संगम के तट हैं।।
और देव भी आज पधारे।पल में संकट विकट उवारे।।
भरना ही है गगरी खाली। स्वागत में तरु-जड़-धड़-डाली।।
“सावित्री की देख सिधाई।अंतक ने जीवन लौटाई।।”
उल्टी गंग बहाने वाली।थी वह नारी भोली-भाली।।
वर देती है सदा सुहागन।साधन पूजन करना पावन।
वट परिक्रमा रखना जारी।तब होगा यह वट आभारी।।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
सेवानिवृत शिक्षक
मध्य विद्यालय दरवेभदौर

