आतप- रोला छंद गीत
आतप से हलकान, हुए अब जन है सारे।
बहुत बनें नादान, समझ कब पाए प्यारे।।
तरुवर डाले काट, खूब उत्पात मचाया।
धरा उगलती आग, नहीं है शीतल छाया।।
पेड़ लगाना भूल, खोजता साधन केवल।
कलयुग किया विकास, प्रकृति की दोहन के बल।।
चिंता में अब लोग, बने फिरते बेचारे।
आतप से हलकान, हुए अब जन है सारे।।०१।।
विटप विलोपित क्षेत्र, धरा भी क्रोधित रहती।
आतप का नित दंश, सदा वह भी है सहती।।
प्यासी धरती आज, कहाँ से जल ले आए।
अपने सुत को त्राण, भला कैसे दे पाए।।
चेतो रहते वक्त, धरा हो विवश निहारे।
आतप से हलकान, हुए अब जन है सारे।।०२।।
निकल रहें तन स्वेद, पिपासा बढ़ती जाती।
सूर्य बनें हैं काल, रश्मियाँ हमें जलाती।।
आतप का यह जुल्म, सभी को होगा सहना।
आओ रोपें पेड़, सभी मिल भाई बहना।।
दूजा नहीं उपाय, हमें जो आज उबारे।
आतप से हलकान, हुए अब जन है सारे।।०३।।
गीतकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क – ९८३५२३२९७८

