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कुंडलियां -रामकिशोर पाठक


Ram Kishore Pathak

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कविता- कुंडलिया

कविता के प्रति मोह से, वनिता होती रुष्ट।
वनिता को जब खुश करें, कविता कहती दुष्ट।।
कविता कहती दुष्ट, प्रेम यह बोलो कैसा।
क्या पाओगे चैन, कभी तुम पहले जैसा।।
तेरे उर का हाल, भला कब समझी वनिता।
रहो सदा बेचैन, न होगी तेरी कविता।।०१।।

कविता शब्दों का नहीं, अंतस् का है भाव।
पत्नी चिढ़कर बोलती, अच्छा नहीं लगाव।।
अच्छा नहीं लगाव, बढ़ाना पर नारी से।
जागे सारी रैन, ग्रसित भी बीमारी से।।
चाहो रोटी दाल, याद आएगी वनिता।
देखो अपना हाल, गई क्या करके कविता।।०२।।

कविता मेरी प्रेमिका, उससे पाऊँ हर्ष।
जिसको पाने के लिए, किया बहुत संघर्ष।।
किया बहुत संघर्ष, रात भर मैंने जागा।
कैसे देगी भाव, पूछता फिरूँ अभागा।।
चाहत मेरी देख, कही वह मुझको सविता।
आकर हर्षित पास, हुई अब मेरी कविता।।०३।।

रचनाकार:- राम किशोर पाठक
प्रधान शिक्षक
सियारामपुर, पालीगंज, पटना, बिहार।
संपर्क – ९८३५२३२९७८

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