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देव नाथ रत्ना का सपना।सच होगा यह जल्दी इतना।।
किसने सोची थीं ये बातें।शीघ्र दिखेगी विस्मित रातें।।
सूरज पश्चिम से निकलेगा।पत्थर पर से बीज उगेगा।
मजबूती से खड़ी रही है।तनिक नहीं वह डरी रही है।।
न्याय नहीं मिलता है जब-जब।प्रकट द्रौपदी होती तब-तब।।
धर्म साथ स्वामी की यारी।होती है नारी आभारी।।
धर्म साथ भगवान दिया है।नारी को सम्मान दिया है।।
जीत गई अभया की माता।ईश्वर से है गहरा नाता।।
वरना कौन सहारा होता।बोझ किसी दूजे का ढोता।।
खुला केश है या चिंगारी।अन्यायी पर होगी भारी।।
कपट जयद्रथ लिए खड़ा है।सूर्य उगे को देख डरा है।।
अब तू सजा मिलेगी निश्चित।काम किया था सचमुच कुत्सित।।
दृश्य देख “अनजान”चकित है।ऊपर का भगवान चकित है।।
रामपाल प्रसाद सिंह अनजान

