वंदनवार सजे शारदा
ऐसा अद्भुत भोर।
क्षितिज चतुर्दिक दे रहा,ऑंधी जैसा शोर।
प्रात:काली भूल कर, पूर्वज ढाड़े लोर।।
कहीं भजन कीर्तन ठने,कहीं राम का बोल।
कहीं शारदा सादगी,सह भोजपुरी झोल।।
कर्ण भला किसकी सुने,झींगुर पकड़े कोर।
सोए पशु-पक्षी नहीं,जागे होकर बोर।।
मंदिर मस्जिद से नहीं,नि:सारित आवाज।
ब्रह्म काल में शोर से,तज मन-खग परवाज।।
देख सजी पगडंडियाॅं,मिली नहीं मग थाह।
आगत-निर्गत शाम दिख,गायें भूली राह।
कहते कवि”अनजान”यह,कलयुग का है जोर।
गत युगों को मिला नहीं,ऐसा अद्भुत भोर।।
रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
मध्य विद्यालय दरवेभदौर
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