कलम -रामपाल प्रसाद सिंह

RAMPAL SINGH ANJAN

कलम ।

मनहर घनाक्षरी

शब्द-शब्द जड़कर,छंद चंद लिखकर,
कागज जो कार करे,
कलम बेचारी है।

चलाती निशाने तीर,बदलती तकदीर,
तोडी़ गुलामी जंजीर,
यह सदाचारी है।

मानस में भाव फले,कलम की धार चले,
समस्या निदान करे,
सबकी आभारी है।

भोजपत्र छोड़कर,नई राह जोड़कर,
करती श्रृंगार यह,
बनी स्वेच्छाचारी है।

किसी को बनाए कवि,नोक से उतारे छवि,
जिसने भी साधा तुझे,
विज्ञानी कहाते हैं।

जिसने भी पूजा तुझे,निशा में पूर्णिमा सूझे,
जीवन सफलतम,
जग में पुजाते हैं।

शब्द से मढ़ाई कर,शब्द से कढ़ाई कर,
साधक हर्षित होते,
जग को लुभाते हैं।

“अनजान”करो यही,दूध से बनाओ दही,
वरना तो दुनिया में,
पशु कहलाते हैं।

रामपाल प्रसाद सिंह ‘अनजान’
अवकाश प्राप्त शिक्षक
मध्यविद्यालय दर्वेभदौर
ओम नमः शिवाय सुप्रभात

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